‘शाखा और सिंदूर’ पहनने से इनकार करने का अर्थ है महिला द्वारा Marriage को अस्वीकार करना पढ़ें पूरी खबर!

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Family Court के आदेश के खिलाफ एक पति की तरफ से दायर वैवाहिक अपील को गुवाहाटी हाईकोर्ट ने स्वीकार करते हुए कहा है कि ‘शाखा (शंख से बनी सफेद चूड़ी) और सिंदूर’ पहनने से इनकार करना इस बात का संकेत है कि Wife अपनी शादी को स्वीकार नहीं कर रही है। इस मामले में फैमिली कोर्ट ने पति की तरफ से दायर तलाक के आवेदन को खारिज कर दिया था।

मुख्य न्यायाधीश अजय लांबा और न्यायमूर्ति सौमित्रा सैकिया की पीठ ने कहा कि हिंदू विवाह की प्रथा के तहत, जब एक महिला हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार Marriage करती है और उसके बाद वह ‘शाखा और सिंदूर’ पहनने से इनकार करती है तो इससे यह प्रतीत होगा कि वह अविवाहित है या फिर उसने अपनी Marriage को स्वीकार करने से इनकार कर दिया है।

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वर्तमान मामले में पीठ ने कहा कि प्रतिवादी-Wife ने अपने प्रति-परीक्षण में स्पष्ट रूप से कहा था, ”मैं अभी सिंदूर नहीं पहन रही हूं क्योंकि मैं इस आदमी को अपना पति नहीं मानती हूं।”

इन परिस्थितियों में पीठ ने कहा कि Family न्यायालय ने ”उचित परिप्रेक्ष्य में साक्ष्यों का मूल्यांकन नहीं किया है।”

पीठ ने कहा कि-

”प्रतिवादी का इस तरह का स्पष्ट रुख उसके स्पष्ट इरादे की ओर इशारा करता है कि वह अपीलार्थी के साथ अपने वैवाहिक जीवन को जारी रखने के लिए तैयार नहीं है। ऐसी परिस्थितियों में अपीलकर्ता पति का प्रतिवादी पत्नी के साथ वैवाहिक जीवन में बने रहना, प्रतिवादी Wife द्वारा अपीलकर्ता और उसके Family के सदस्यों का उत्पीड़न माना जाएगा।”

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ससुराल वालों के साथ रहने से इनकार करना है क्रूरता के समान

इसी बीच पीठ ने कहा कि प्रतिवादी-पत्नी ने अपने ससुराल वालों के साथ रहने से इनकार कर दिया था। उसने वास्तव में एक समझौते किया था जिसके तहत अपीलकर्ता Husband को उसे वैवाहिक घर से दूर एक किराए का अलग मकान दिलवाने की आवश्यकता थी।

अदालत ने कहा कि एक बेटे (अपीलकर्ता) को उसके Family से दूर रहने के लिए मजबूर करना, प्रतिवादी-पत्नी की ओर से क्रूरता का एक कार्य माना जा सकता है।

पीठ ने कहा कि मैंटेनेंस एंड वेल्फेयर ऑफ पेरेंट्स एंड सीनियर सिटिजन एक्ट 2007 के तहत बच्चों द्वारा अपने Mother-Father का रख-रखाव करना अनिवार्य है।

इन परिस्थितियों में पीठ ने कहा कि-

”यह देखने में आया है कि Family Court ने सबूतों पर विचार करने के दौरान इस तथ्य को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया था। जबकि अपीलकर्ता को ACT 2007 के प्रावधानों के तहत उसका वैधानिक कर्तव्य पूरा करने से रोका गया है,जो उसका अपनी वृद्ध मां के प्रति बनता है। इस तरह के सबूत क्रूरता का कृत्य साबित करने के लिए पर्याप्त हैं, क्योंकि 2007 अधिनियम के प्रावधानों का पालन न करने के आपराधिक परिणाम होते हैं, जिनमें दंड या Corona Virus के साथ-साथ जुर्माना किए जाने का भी प्रावधान है।”

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अप्रमाणित आपराधिक मामला दायर करना है क्रूरता के समान

High Court ने दोहराया कि पति या पति के परिवार के सदस्यों के खिलाफ निराधार आरोपों के आधार पर आपराधिक केस दर्ज करवाना भी क्रूरता के समान है। वर्तमान मामले में, प्रतिवादी-Wife ने अपीलकर्ता और उसके परिवार के खिलाफ तीन आपराधिक शिकायतें दर्ज की थीं, जिनमें से एक को खारिज कर दिया गया था।

इस प्रकार रानी नरसिम्हा शास्त्री बनाम रानी सुनीला रानी, 2019 ACC Online SC 1595, मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए फैसले पर भरोसा करते हुए पीठ ने कहा कि-

”Husband और Family के सदस्यों के खिलाफ आईपीसी की धारा 498 (A) आदि के तहत आपराधिक मामले दर्ज करवाना, जिसे बाद में Family Courtद्वारा खारिज कर दिया जाता है, यह Wife द्वारा की गई क्रूरता के समान ही है या उसे साबित करने के पर्याप्त है … यह स्पष्ट है कि इस Marriage को जारी रखने से कोई उद्देश्य पूरा नहीं होगा क्योंकि दोनों पक्षों के बीच वैवाहिक सामंजस्य नहीं रहा है।”

इसलिए अपील को स्वीकार करते हुए High court ने तलाक की डिक्री पारित कर दी।

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